श्राद में पितरो को ऐसे करे प्रसन्न ! Shrad Ki Vidhi - Raambaanilaj.com

Wednesday, 6 September 2017

श्राद में पितरो को ऐसे करे प्रसन्न ! Shrad Ki Vidhi

Raam Baan
आपको पता होगा श्राद लग चुके है, श्राद का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है, आज हम जानेगे की श्राद में सही विधि से पितरो को तर्पण देने से हमारे जीवन पर क्या सकरतात्मक प्रभाव पड़ता है व् जीवन की समस्त परेशानी व् धन की कमी दूर हो जाती है. 
शास्त्रों में बताया गया है कि गया, बद्रीनाथ के ब्रह्मकपाल, गोदावरी तट एवं प्रयाग में श्राद्घ और तर्पण 
करने से पितर जल्दी खुश हो जाते हैं और उन्हें मुक्ति मिल जाती है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति श्राद्घ पक्ष में इन तीर्थ स्थानों पर जाकर श्राद्घ तर्पण कर सके। इसलिए शास्त्रों में कुछ ऐसे नियम बताए गए हैं कि जिससे घर पर रह कर ही श्राद्घ पक्ष में पितरों को खुश किया जा सकता है।

श्राद Shrad के दिन सूर्योदय से लेकर दिन के 12 बजकर 24 मिनट की अवधि के मध्य ही श्राद्ध करें। प्रयास करें कि इसके पहले ही ब्राह्मण से तर्पण आदि करा लिए जाए। इसके लिए सुबह उठकर स्नान करना चाहिए, तत्पश्चात देव स्थान और पितृ स्थान को गाय के गोबर से लीपना चाहिए और गंगाजल से पवित्र करना चाहिए। पितरों के निमित्त अग्नि में गाय का दूध, दही, घी एवं खीर का अर्पण करें। ब्राह्मण भोजन से पहले पंचबलि यानी गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए भोजन सामग्री पत्ते पर निकालें। 
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इसके बाद भोजन थाली अथवा पत्ते पर ब्राह्मण हेतु भोजन परोसें।ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करे और कर्ता क्रोघ न करें। शास्त्र में कहा गया है कि पितृ पक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में उन्नति होती है। साथ ही आपके कार्य व्यापार, शिक्षा अथवा वंश वृद्धि में आ रही रुकावटें दूर हो जाएंगी

श्राद्ध में क्या करें
इन दिनों में शास्त्रानुसार- मसूर की दाल, मटर, राजमांह, कुलथी, मदार की दाल, धतूरा एवं अलसी का प्रयोग वर्जित है। घर में तामसी भोजन न बनाएं तथा किसी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन न करें। श्राद्ध पक्ष में दिन में सोना, शरीर पर तेल, साबुन और इत्र आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

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जिस दिन किसी का श्राद्ध करना हो उस के पहले दिन विद्वान ब्राह्मण को बड़े आदर भाव से भोजन का निमंत्रण देना चाहिए तथा मध्यान्हकाल में बढ़िया एवं मीठा भोजन खिलाकर ब्राह्मण को दक्षिणा में फल आदि देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इस दिन पितर गायत्री मंत्र और पितर स्तोत्र का पाठ दक्षिणा मुखी होकर करना चाहिए। इस दिन कौवे, गाय और कुत्ते को ग्रास अवश्य डालें क्योंकि इनके बिना श्राद्ध अधूरा ही रहता है। चींटियों को भी आटा-चावल,अन्न आदि डालना चाहिए।

पितरों की संतुष्टि के लिए श्राद्ध विधि-विधान से करना चाहिए। किंतु अगर आप किसी कारणवश शास्त्रोक्त विधानों से न कर पाएं तो यहां बताई श्राद्ध की सरल विधि को अपनाएं -
सुबह उठकर स्नान कर देव स्थान व पितृ स्थान को गाय के गोबर से लीपकर व गंगाजल से पवित्र करें।
घर आंगन में रंगोली बनाएं।
महिलाएं शुद्ध होकर पितरों के लिए भोजन बनाएं।
श्राद्ध का अधिकारी श्रेष्ठ ब्राह्मण (या कुल के अधिकारी जैसे दामाद, भतीजा आदि) को न्यौता देकर बुलाएं।
 ब्राह्मण से पितरों की पूजा एवं तर्पण आदि कराएं।
पितरों के निमित्त अग्नि में गाय का दूध, दही, घी एवं खीर अर्पित करें। गाय, कुत्ता, कौआ व अतिथि के लिए भोजन से चार ग्रास निकालें।
ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराएं, मुखशुद्धि, वस्त्र, दक्षिणा आदि से सम्मान करें।


श्राद में जानने योग्य बातें
1- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रहकर भोजन करें।

2- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।

3- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।

4- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पहने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।

5- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
6- श्राद्ध Shrad में जौ, कांगनी, मटर और सरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।

7- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।

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