जगन्नाथ मंदिर का ध्वज हमेशा हवा के विपरीत क्यों उड़ता है? जानिए रथयात्रा से जुड़ी रोचक परंपराएं

Jagannath Rath Yatra - जगन्नाथ रथ यात्रा  Image Source : INSTAGRAM/PUBLICCIVILNEWS.IN

पुरी का जगन्नाथ मंदिर चार धामों में से एक है। यह मंदिर पुरी शहर में स्थित है। इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ के साथ-साथ भगवान बलराम और देवी सुभद्रा की मूर्ति है जो कि विश्वभर में मशहूर है। हर साथ पुरी के अलावा कई और जगहों पर भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है। इस बार कोरोना वायरस की वजह से इस यात्रा को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मामला पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट से जगन्नाथ रथ यात्रा को अनुमति मिल गई है लेकिन इस बार जनता इसमें शामिल नहीं होगी। इस रथ यात्रा की शुरुआत 23 जून को होगी।

'अगर भगवान जगन्नाथ कल नहीं निकले, तो 12 साल तक नहीं निकल सकते'

हर साल इस विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा में देश-विदेश के श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं। लेकिन इस बार रथ यात्रा का बदला हुआ रूप देखने को मिलेगा। इस यात्रा में पारंपरिक रीति के अनुसार लकड़ी के बने विशाल रथों को भक्त अपने हाथों से खींचते हैं। इस रथ यात्रा में तीन रथ होते हैं। एक रथ श्री कृष्ण का, एक बलराम का और एक उनकी बहन सुभद्रा का। रथ यात्रा में सबसे आगे बलराम का रथ उसके बाद उनकी बहन सुभद्रा और सबसे पीछे भगवान श्री कृष्ण का रथ होता है।

मान्यता है कि इस रथयात्रा के दौरान उस रथ की रस्सी खींचने या छूने मात्र से ही मोक्ष का प्राप्ति हो जाती है। इस रथ यात्रा के द्वारा भगवान जगन्नाथ को गुंडिचा माता मंदिर ले जाया जाता है। यहां पर भगवान जगन्नाथ आराम करते हैं। 

इस रथ यात्रा के लिए लकड़ी से रथों का निर्माण किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ की ऊंचाई करीब 45 फीट और चौड़ाई 35 फीट तक होती है। भगवान जगन्नाथ के रथ में 16 पहिए लगे होते हैं। सभी रथों को लाल, पीले और हरे रंग से रंगकर तैयार किया जाता है। जो देखने में बहुत सुंदर होते हैं। 

विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ जी के मंदिर में कई रहस्य हैं जिन्हें आप नहीं जानते होंगे। जैसे- हवा के विपरीत हमेशा लहराता हुआ ध्वज और गुंबद की परछाई का न बनना। जानिए इनके बारे में....

हवा के विपरीत हमेशा लहराता है ध्वज

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस मंदिर के शिखर में जो लाल रंग का ध्वज लगा हुआ है वो हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराता है। जो कि आश्चर्य से कम नहीं है। साथ ही प्रतिदिन शाम के समय मंदिर के ऊपर स्थापित ध्वज को मंदिर के किसी व्यक्ति द्वारा उल्टा चढ़कर बदला जाता है। इस ध्वज पर शिव का चंद्र बना हुआ होता है।

नहीं बनती गुंबद की परछाई 
यह विश्व का सबसे भव्य और ऊंचा मंदिर है। यह मंदिर 4 लाख वर्गफुट में क्षेत्र में फैला है और इसकी ऊंचाई लगभग 214 फुट है। मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुंबद देख पाना असंभव है। मुख्य गुंबद की छाया दिन के किसी भी समय अदृश्य ही रहती है। यानि कि कोई परछाई नहीं दिखाई देती है।

रहस्यमयी सुदर्शन चक्र
इस मंदिर में शिखर में लगा सुदर्शन चक्र को आप पुरी से कहीं से भी देख सकते हैं। इसके अलावा इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि आप किसी भी जगह से देखें ये हमेशा सामने से दिखेगा। इसे नीलचक्र भी कहते हैं। यह अष्टधातु से निर्मित है। इससे पवित्र माना जाता है।

मंदिर के ऊपर एक भी पक्षी नहीं उड़ते
आपको यह बात जानकर हैरान होंगे कि इस मंदिर के ऊपर गुंबद के आसपास अब तक कोई पक्षी उड़ता हुआ नहीं देखा गया। साथ ही इसके ऊपर से विमान नहीं उड़ाया जा सकता। इस मंदिर के शिखर के पास पक्षी उड़ते नजर नहीं आते, जबकि सामान्य तौर पर मंदिरों के गुंबदों पर पक्षी बैठ जाते हैं या आसपास उड़ते हुए नजर आ जाते हैं। 



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