मां और बेटी के संबंधों को दर्शाती कहानी बिछुए, कविता आखरी पड़ाव में उम्र के अंतिम दौर की भावनाओं को व्यक्त करती है

कहानी : बिछुए
लेखिका : प्रज्ञा तिवारी

माहौल में ख़ुशी और ग़म दोनों की रंगत थी। आख़िर बेटी की विदाई का पल ही कुछ ऐसा होता है। मां चकरघिन्नी बनी हुई थी। ये लाओ, उसे रखो... इन सबके बीच घूमती मां ने एक नज़र दुल्हन बनी अपनी छोटी बेटी रानी पर डाली तो बरबस आंसू बह पड़े।

तभी बड़ी बेटी राधिका मां के पास आकर दर्द से कराहती हुई बोली, ‘मां, देखो न, ये बिछुए चुभ रहे हैं, चल भी नहीं पा रही।’ रानी की बिदाई का सामान पैक करती मां को सांस लेने तक की फुर्सत नहीं थी, ‘जा जाकर कड़वा तेल लगा ले, क्या ज़रूरत थी नए बिछुए पहनने की, अभी मुझे तो बिल्कुल फुर्सत नहीं है।’ अपना काम करते-करते हुए मां ने कहा। राधिका भी लंगड़ाते हुए वहां से चुपचाप चली गई।

जैसे-जैसे बेटी की विदाई का पल क़रीब आने लगा, मां के हाथ-पांव फूलने लगे, दिल की धड़कन अचानक थमती और अगले ही पल तेज़ी से दौड़ने लगती। रिश्तेदार समझा रहे थे, ‘बड़ी क़िस्मत वाली हो तुम जो इतनी जल्दी दोनों बेटियों के हाथ पीले करके गंगा नहा लीं, वरना आज के ज़माने में बेटियों को इतनी आसानी से अच्छे घर कहां मिल पाते हैं!’

‘हां, अच्छे घर... यही सुकून की बात है। दोनों बेटियां अच्छे घरों में हैं, इससे ज़्यादा और क्या चाहिए!’ यही सोचकर मां ने राहत की सांस ली और पानी का गिलास उठाया। तभी राधिका फिर से आई। ‘मां!’ इस बार उसने धीरे से आवाज़ लगाई। ‘तू यहां क्या करने आ जाती है बार-बार, अपनी बहन के पास जाकर बैठ न, उसे कोई ज़रूरी बात कहनी हुई तो किससे कहेगी?’ मां ने समझाते हुए कहा।

‘मां, मेरी भी बिदाई की तैयारी कर दो, अभी मुझे भी निकलना है!’ ‘तू कहां जा रही है?’ मां ने हैरानी से पूछा। ‘मां... ये (राधिका का पति) ज़िद कर रहे हैं, इनके साथ ही ससुराल चलने के लिए!’
‘अरे...! ऐसे कैसे ज़िद करे हैं, इतनी जल्दी कैसे जा सकते हैं दामाद जी, तू रुक मैं बात करती हूं उनसे।’ फलों की डलिया वहीं पटक मेहमानों की भीड़ चीरते हुए मां बाहर निकल गईं।

‘नहीं... आप नहीं मां.... रुको...’ पीछे से राधिका चिल्लाती रह गई लेकिन मां सीधे अपने दामाद के पास पहुंच गईं।
‘दामाद जी! ये क्या सुन रही हूं मैं? आप लोग अभी से जा रहे हैं?’

‘जाना होगा मां जी घर से फोन आ रहा है।’ दामाद जी बोले। ‘अभी रानी की बिदाई होने दो बेटा, आप लोग तो घर के हैं, आराम से विदा कर दूंगी। वैसे भी एक बेटी की बिदाई में छाती फट रही है, दोनों बेटियां एक साथ चली गईं तो मैं इस घर में मर ही जाऊंगी!’ रुंधे गले से जैसे-तैसे आवाज़ निकल पाई।

‘हम्म...’ दामाद जी कुछ सोचते हुए बोले, ‘राधिका चाहे तो यहां रुक जाए, मुझे तो अभी जाना है। मेरे पापा जी को ज़्यादा भीड़ बर्दाश्त नहीं होती। वो और ज़्यादा यहां रुके तो बीमार पड़ जाएंगे।’ एक चालाक व्यापारी की तरह दामाद जी ने अपनी बात मां को समझा दी।

दामाद जी की ज़िद और तर्क के आगे उन्होंने हार मान ली। मगर राधिका के रुकने भर से मन ने राहत की सांस लेकर दामाद को हज़ारों दुआएं दे डालीं। ‘तू भी न राधिका फालतू में हल्ला करती है, कितना भला लड़का मिला है तुझे। मेरे कहे बिना ही तुझे रुकने को कह दिया उन्होंने, ऐसा दामाद भगवान सबको दे।’

राधिका का चेहरा देखे बिना मां कहकर चली गईं। ख़ुशी और ग़म के बीच रानी गाड़ी मैं बैठकर विदा हो गई। बेटी की बिदाई में दुश्मन भी पिघल जाए, मां तो बेसुध-सी हो गईं। इधर राधिका भी अपना सामान लेकर तैयार खड़ी थी। मां कुछ समझ ही नहीं पा रही थीं। दामाद जी भी अपने पापा के साथ गाड़ी में बैठ चुके थे।

‘तू कहां चली बिटिया? और ये घूंघट क्यों डाला हुआ है? मां ने पूछा तो राधिका मां के गले लग गई, ‘ससुर जी हैं न साथ, इसलिए घूंघट ले लिया। मुझे जाने दो मां...’ राधिका की आवाज़ भर्रा गई। वह झट से मां से अलग हुई, बाक़ी मेहमानों से विदा ली और बाहर जाने लगी। मां को घबराहट हो रही थी, शरीर तो थक ही चुका था, अब दिमाग़ भी सुन्न पड़ चुका था।

आख़िर में रहा नहीं गया तो जाकर राधिका के गले लग गई, ‘मां से क्यूं घूंघट कर रही है पागल! एक बार अपनी बेटी का चेहरा तो देख लेने दे।’ एक झटके से मां ने घूंघट खींच दिया, राधिका ने छटपटाकर घूंघट पकड़ना चाहा मगर पकड़ न सकी। एक पल को मां की आंखों के सामने अंधेरा छा गया।

नीली पड़ी आंख की कोर, होंठ के नीचे रिसता हुआ ख़ून, गाल पर उंगलियों की नीली छाप सारी कहानी बयां कर गए थे। मेहमानों की नज़र पड़े, उससे पहले मां ने खुद ही घूंघट वापस डाल दिया। दामाद हॉर्न पे हॉर्न बजाए जा रहा था। राधिका बाहर निकलने को हुई तो मां ने लड़कों को उसका सामान वापस अंदर लाने को कहा और उसका हाथ पकड़कर वापस लौटने लगी।

‘ऐसा मत करो मां... प्लीज़ जाने दो। आपको मेरी क़सम..!’ राधिका गिड़गिड़ाने लगी। ‘तेरी क़सम का मान रखने से कौन-सा तू ज़िंदा रहने वाली है!!’ मां ने ग़ुस्से से उसे घूरते हुए कहा, ‘अब एक शब्द और मत कहना तू।’
‘इंसान मरने के बाद ही गंगा नहाता है, बेटियों की शादी करके नहीं।’ मां ने आंगन में ज़ोर से कहा और राधिका को उसके कमरे में ले गईं।

मां-बेटी ने एक-दूसरे के सामने सारे दर्द उड़ेल दिए। जितनी बार मां राधिका का नीला पड़ा चेहरा देखतीं, उनका ख़ून खौल उठता। रात भर मां उसके सिरहाने बैठ सोचती रहीं, ‘एक मां होकर मैं क्यों अपनी बेटी की आंखों में छिपा दर्द नहीं देख पाई।

अनपढ़ हूं मगर इतनी भी नहीं कि बेटी का मन न पढ़ सकूं। हर बार मायके आने के नाम पर काम का बहाना करना, मायके आने पर भी चेहरे पर ख़ुशी की जगह ख़ौफ़ बना रहना, पति की बात आने पर बात घुमा देना, बेवजह चेहरे पर मेकअप की परतें चढ़ाते रहना... क्यों कुछ नहीं समझ पाई।

दो साल से दामाद को बेटा मानते ही बेटी का दर्द आंखों से ओझल कैसे हो जाने दिया, आज उस लड़के की इतनी हिम्मत बढ़ गई कि मेरे ही घर में आकर मेरी बेटी पर...?’
‘मां बिछुए चुभ रहे हैं!’ बेटी नींद में ही दर्द से कुनमुनाई। मां ने राधिका के पैरों को देखा, उंगलियां पानी में काम करते-करते गल चुकी थीं। अचानक मां को न जाने क्या सूझा, एक-एक करके राधिका के सारे बिछुए उतार फेंके। ‘ये क्या कर रही हो मां? दर्द हो रहा है।’ अपने पैरों को खींच राधिका उठकर बैठ गई।

उसके पैरों को गोद में रख मलहम लगाते हुए मां बोलीं, ‘इसी दर्द से तुझे आज़ादी दिला रही हूं बेटा, अब ये बिछुए नहीं चुभने दूंगी तुझे।’ राधिका को मां की बातें समझ नहीं आईं मगर घाव पर ममता का स्पर्श लगा तो दर्द में राहत ज़रूर मिली थी। वह वापस सो गई। राधिका की बेपरवाह नींद इस चुभन से आज़ाद होने की निशानी थी।

मां अब भी जाग रही थीं, अंधेरा छंटने के इंतज़ार में- बेटी की ज़िंदगी से भी और अपने आंगन से भी। अगली सुबह उन ज़मीन पर पड़े बिछुओं की चुभन का हिसाब लेना भी तो बाक़ी था।

कविता : आखरी पड़ाव में

लेखिका : अनीता वाधवानी

मैंने बंद कर दी है सौदेबाज़ी
लेनदेन रिश्तों के बाज़ार में
कुछ देने में ही बादशाही है
तो लेने की फिक्र क्यों करूं
जीवन के इस आख़िर पड़ाव में।
छोड़ दी हैं क्षुद्र अपेक्षाएं
जिनसे हासिल न कुछ होना था
भुरभुरी मिट्टी के सिवाय
पर अब बनना है चट्टान सम
जीवन के इस आख़री पड़ाव में।
सबसे प्यार करने के बाद
अब कुछ कुछ प्यार
खुद से भी करने लगी हूं
ज़िंदगी को समझने लगी हूं
जीवन के इस आखरी पड़ाव में।
मैं सिकंदर की तरह सब जीतकर
ख़ाली हाथ नहीं जाऊंगी
व्यर्थ का सब कुछ हार कर
फिर जीत कर जाऊंगी
जीवन के इस आखरी पड़ाव में।
मैं जुड़ने लगी हूं अपने आप से
मेरे भीतर में जो है चैतन्य
थामने लगी हूं उसका हाथ
जो रहेगा मेरे बाद भी मेरे साथ
जीवन के इस आखरी पड़ाव में...



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A story depicting the relationship between mother and daughter, the poem expresses the feelings of the last stages of age at the last stage


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