''मददगार'' एक ऐसी लघुकथा जो रात के अंधेरे में रीता की आप बीती बयां करती है, वहीं ''वर्क फ्रॉम होम'' लॉकडाउन में ऑफिस की याद दिलाती है

मददगार
लघुकथा... गोविंद भारद्वाज

गाड़ी ख़राब होने के कारण रीता को पैदल ही घर के लिए निकलना पड़ा। रात ज़्यादा होने की वजह से अंधेरा भी घना था। सूनी और लम्बी-सी सड़क पर कोई नहीं था, सिवाय डर के। तभी कुछ मनचले लड़कों की नज़र अकेली रीता पर पड़ गई।

वे दौड़कर उसकी तरफ़ इस तरह आए जैसे भूखे भेड़ियों को काफ़ी दिनों बाद कुछ खाने को दिखाई दिया हो। वे रीता तक पहुंचकर कुछ कहते, उससे पहले एक नौजवान लगभग दौड़ता हुआ अचानक सामने आकर बोला, ‘आप डरें नहीं..मैं आपके साथ हूं।’

उसे देखकर लड़के हकबका गए। उधर एक अजनबी के मुंह से ये वाक्य सुनकर रीता को हैरानी तो हुई पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन क्या करती... कम से कम बात से तो भला लग रहा था। ख़ैर! मनचले लड़कों ने अपना रास्ता बदल लिया।
कुछ दूर चलने के बाद रीता का घर आ गया था। उस नौजवान अजनबी से उसने कहा, ‘आपका बहुत-बहुत शुक्रिया।’ ‘शुक्रिया की इसमें कोई बात नहीं है। एक बहन की रक्षा करना हर भाई का फ़र्ज़ होता है। मैंने तो सिर्फ़ फ़र्ज़ निभाया है।’

‘क्या आपने मुझे बहन कहा..! न जान... न पहचान...। एक अकेली लड़की को रात के अंधेरे में बहन कहने वाला आदमी तो हो ही नहीं सकता।’ कहते हुए रीता की आंखें नम हो गईं।
‘तो कौन हो सकता है?’ अजनबी ने पूछा।

‘फ़रिश्ता...’ रीता ने कहा।


लघुकथा...वर्क फ्रॉम होम

लेखिका : ललिता भाटिया

अक्सर सुनती कि विदेशों में वर्क फ्रॉम होम होता है। कैसे करते होंगे काम? क्या घर के सदस्य डिस्टर्ब नहीं करते होंगे? पर मज़ा भी कितना आता होगा। सुबह उठने की जल्दी नहीं होती होगी। मन में इच्छा जागती थी कि कभी मैं भी घर से काम करूं।

कोरोना ने आकर मेरी यह इच्छा पूरी कर दी। कोरोना के चलते पूरे देश में लॉकडाउन हो गया। ऑफिस बंद कर दिए गए और सबके लिए घर से काम करने के ऑर्डर हो गए। मुझे तो मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई। कहीं जाने की जल्दी नहीं होती।

8:30 बजे उठो और नहा-धोकर टेबल पर बैठ जाओ। सुबह की चाय भी मम्मी टेबल पर ही देतीं और उसके बाद नाश्ता भी। दोपहर का लंच मैं अपने परिवार के साथ करती। दो-चार दिन तो सब ठीक-ठाक चला, उसके बाद कुछ हास्यास्पद परिस्थितियां निर्मित होने लगीं।

एक दिन मेरी अपने बॉस के साथ मीटिंग चल रही थी। मम्मी गैस पर कुकर चढ़ाकर नहाने चली गई थीं। साथ ही मुझे हिदायत दे गईं कि चार सीटी आने के बाद गैस बंद कर देना।

मम्मी नहाकर आईं, मैं तब भी मीटिंग में थी। आते ही उन्होंने पूछा, ‘कितनी सीटियां आईं?’
मैंने जवाब दिया, ‘चार।’
‘नहीं, पांच सीटियां आ गई हैं!’ उधर से मेरे बॉस बोले। बताइए उस समय मेरी क्या हालत हुई होगी।
मैं एक दिन फोन को स्पीकर पर लगा अपने एक सहकर्मी से बात कर रही थी।

उससे किसी का फोन नंबर लेना था। नोट करते वक़्त मैंने दुहराते हुए कहा, ‘98 96... हां उसके बाद?’
‘अरे उसने 156 भी बोला है।’ मेरी मम्मी बोलीं, ‘तुम्हारा ध्यान किधर रहता है?’

लो और लो घर से काम करने का स्वाद!
सचमुच! घर में सब सुख-सुविधाएं होते हुए भी मैं ऑफिस को बहुत मिस करती हूं। ऑफिस में लंच के समय एक-दूसरे से टिफिन शेयर करना, जब मिल-बैठकर गप्पे मारते साथ-साथ शाम की चाय पीते थे, वाक़ई क्या दिन होते थे।

शाम को जब घर वापस लौटती तो आते ही मम्मी दो कप चाय के तैयार रखतीं। दोनों बैठकर आराम से चाय पीते और दिन भर में क्या हुआ एक-दूसरे को बताते थे।

पर आजकल तो मम्मी आराम से बैठकर टीवी देख रही होती हैं और छह बजे जब मैं अपने ऑफिस का काम करके कमरे से बाहर आती हूं तो कहती हैं, ‘बेटा, ऑफिस से छुट्टी हो गई है तो जल्दी से दो कप चाय बना ला, मिलकर पिएंगे।’
आई मिस माय ऑफिस...!



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"Helpful" is a short story that speaks to Rita in the dark of night, while "Work from Home" reminds me of the office in lockdown.


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