कहानी 'चंगा पो' बयां करती है लॉकडाउन में दादी को मिला परिवार का सुख, वहीं कविता 'दिमाग वाली स्त्री' से जानें आधुनिक नारी के ख्यालात

कहानी...चंगा-पो

लेखक : अतुल कनक

पिता की परवाह की सीमा उनकी सम्पत्ति है, इसका अहसास बाबूजी को था। उन्होंने वसीयत की, अपनी अहमियत को ध्यान में रखते हुए।

कोरोना वायरस का प्रकोप शुरू हुआ तो देश भर में अजीब-सी दहशत का माहौल बन गया। पोती दूसरे शहर में पढ़ रही थी, लेकिन उन्होंने बेटे से ज़िद करके उसे भी अपने पास ही बुला लिया। जान से ज़्यादा क़ीमती थोड़े ही होती है पढ़ाई। ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा! यही न कि एक साल ख़राब हो जाएगा। लेकिन उस पराए शहर में बेटी को कुछ हो गया तो? हालांकि वापसी के बाद पोती ने बताया कि उसका काॅलेज दो दिन बाद बंद हो जाएगा और कब खुलेगा- यह पता नहीं। प्रिंसिपल ने कहा है कि वो काॅलेज के सोशल मीडिया ग्रुप में ख़बर कर देंगी।

पोती को लौटे कुछ दिन ही हुए थे कि देश भर में लाॅकडाउन की घोषणा हो गई। अब वो सबको समझाते हुए कहने लगीं- ‘मैं तो जानती थी कि ऐसा ही कुछ होगा। तभी तो मैंने पोती को भी बुला लिया था। आंखों की रोशनी कमज़ोर हुई है, लेकिन पच्यासी सालों में इन आंखों ने दुनिया को इतना देखा है कि बहुत सारी चीज़ों को समझने के लिए कुछ भी देखने की ज़रूरत नहीं पड़ती।’ फिर वो अपनी पसंद की कोई किताब पढ़ने लगतीं या फिर माला फेरने लगतीं। पिछले कुछ दिनों से उन्होंने टीवी देखना भी बंद कर रखा था।

वो एक स्कूल के प्रिंसिपल के पद से सेवानिवृत्त हुई थीं। उम्र पच्यासी बरस हो गई थी लेकिन आज भी बहुत से लोग उन्हें बहनजी कहकर ही पुकारते थे। कई बार मौक़ा मिलता तो वो स्कूल में अपने रौब की कहानियां भी सुनाती थीं। कहतीं- ‘मेरे पढ़ाए बच्चे आज भी कहीं मिलते हैं तो पहचान जाते हैं और हंसते हुए बताते हैं कि मैंने किस बात पर नाराज़ होकर उन्हें कक्षा से बाहर निकाला था या कान पकड़कर कोने में खड़ा कर दिया था।

कुछ तो बहुत बड़े अफ़सर हो गए हैं। दरअसल, उस ज़माने में टीचर यदि बच्चे को पीट देता था तो माता-पिता इतना बुरा नहीं मानते थे कि मामले को थाने तक ले जाएं। उनका भी मानना होता था कि टीचर ने बच्चे की भलाई के लिये ही ऐसा किया होगा। अब तो चीज़ें बहुत बदल गई हैं।’

लाॅकडाउन लगा तो सब अपने-अपने घरों में क़ैद होकर रह गए। वो पहले एक परिचित ऑटो वाले को बुलाकर कभी-कभी किसी रिश्तेदार के यहां हो आया करती थीं। लेकिन लाॅकडाउन के शुरुआती दिनों में तो घर से आवाजाही पर ही प्रतिबंध था।

जब लाॅकडाउन के प्रतिबंधों में ढील शुरू हुई, तब भी बेटे ने समझाया कि फिलहाल बाहर निकलना उनकी उम्र के लोगों के लिए सुरक्षित नहीं है क्योंकि संक्रमण शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को बुरी तरह ख़राब कर देता है। वो अपने कमरे से बाहर निकलतीं और यह कहते हुए आंगन में रखी अपनी कुर्सी पर बैठ जातीं, ‘सीताराम, सीताराम, सीताराम कहिए/ जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए।’

लाॅकडाउन शुरू हुआ तो सब घरों में क़ैद थे। इस मजबूरी ने सबको परेशान कर दिया था। लेकिन उनके लिए तो जैसे चहक के दिन लौट आए थे। इकलौती पोती- जो दूर एक महानगर में पढ़ती थी, उनके पास लौट आई थी। बेटा दिन भर नौकरी और बैठकों में व्यस्त रहता था, वो भी उनके पास ही बैठकर बतियाता रहता था।

बहू घर का काम करती और वो भी आकर उनके पास बैठ जाती। पहले वो भी इधर-उधर के कामों में व्यस्त रहती थी। एक पालतू कुत्ता था जो कभी उनके पास आकर बैठ जाता, कभी घर के मुख्यद्वार पर बैठकर घर के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाता रहता था। कामवाली बाइयों का आना लाॅकडाउन में बंद हो गया था।... तो एक बार फिर आपस में साथ बैठने और बतियाने का सिलसिला शुरू हो गया। कई बार वो अपने आप से कहतीं- ‘कोरोना ने इतना सुख तो दिया।’

एक दिन बातों ही बातों में उन्होंने अपनी पोती से कहा कि उनकी जवानी के दिनों में जब दोपहर में लोग अपने काम निबटा लेते थे तो चंगा-पो (अष्टा चंगा पो) खेलते थे। पोती ने इस खेल का नाम ही नहीं सुना था। उसने रुचि दिखाई तो उन्होंने चंगा-पो के बारे में बताया।

फिर कांपते हाथों से लकड़ी के एक पट्टे पर चाॅक की मदद से चंगा-पो बना भी दिया। पोती ने ज़िद की तो उन्होंने अपने बेटे और बहू को भी साथ बिठा लिया खेलने के लिए। बस, अब तो नियम ही हो गया। रोज़ शाम को तीन-चार बाज़ी होतीं चंगा-पो की। आपस में हंसी-मज़ाक भी होता।

लाॅकडाउन ने जैसे उनके लिए नई चहक के द्वार खोल दिए थे। चूंकि उनके अलावा किसी के पास चंगा-पो का पुराना अभ्यास नहीं था, इसलिए शुरू-शुरू में तो वो ही जीततीं, लेकिन तीन-चार दिन बाद पोती ने उन्हें हराना शुरू कर दिया। वो जैसे ही हारतीं, पोती उल्लास से कहती- ‘देखा दादी, आपसे ही सीखकर आपको ही हरा दिया न।’ दादी पोती की बात सुनकर हंस देतीं। ये सच तो वो ही जानती थीं न कि पोती की रुचि खेल में बनाए रखने के लिए उन्होंने जानबूझकर ऐसी ग़लतियां कीं कि उनकी हार हो जाए।

अनलाॅक की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बेटा ऑफिस जाने लगा है। बहू ने शुरू में तो सारे सामान ऑनलाइन ही मंगाए थे, लेकिन अब वो भी कभी-कभी बाज़ार जाने लगी है। पोती की ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हो चुकी है। वो जानती हैं कि सब शाम तक थक जाते होंगे लेकिन फिर भी वो अपने पलंग पर लकड़ी का वही पट्टा लेकर अकेली ही चंगा पो खेलने का अभ्यास करती रहती हैं। ऐसे में कभी पोती, बहू या बेटा आकर कह दें कि ‘एक बाज़ी हो जाए’- तो वो जैसे खिल उठती हैं।

इन दिनों चंगा-पो खेलते हुए वो प्रायः सभी से हारने लगी हैं। लेकिन इस हार का सच केवल वो ही जानती हैं। पच्यासी बरस की उम्र में इतना तो वो समझ ही गई हैं कि किसी भी खेल में जीतना उतना ज़रूरी नहीं होता, जितना मिल-जुलकर खेलना। यूं भी अपनों से हारने का सुख क्या है, यह बात भी उनसे बेहतर कौन समझ सकता है?

कविता... दिमाग़वाली स्त्री से प्रेम

लेखक : अनुपमा भगत

आसान नहीं होता दिमाग़वाली स्त्री से प्रेम करना,

क्योंकि उसे पसंद नहीं होती जी हुज़ूरी,

झुकती नहीं वो कभी जब तक न हो

रिश्तों और प्रेम की मजबूरी।

तुम्हारी हर हां में हां औरन में न कहना वो नहीं जानती,

क्योंकि उसने सीखा ही नहीं झूठ की डोर में रिश्तों को बांधना।

वो नहीं जानती स्वांग की चाशनी में डुबोकर अपनी बात मनवाना,

वो तो जानती है बेबाकी से सच बोल जाना।

फ़िज़ूल की बहस में पड़ना उसकी आदतों में शुमार नहीं,

लेकिन वो जानती है तर्क के साथ अपनी बात रखना।

वो क्षण-क्षण गहने-कपड़ों की मांग नहीं किया करती,

वो तो संवारती है स्वयं को आत्मविश्वास से,

निखारती है अपना व्यक्तित्व मासूमियत भरी मुस्कान से।

तुम्हारी ग़लतियों पर तुम्हें टोकती है,

तो तकलीफ़ में तुम्हें संभालती भी है।

उसे घर संभालना बख़ूबी आता है,

तो अपने सपनों को पूरा करना भी।

अगर नहीं आता तो किसी की अनर्गल बातों को मान लेना।

पौरुष के आगे वो नतमस्तक नहीं होती,

झुकती है तो तुम्हारे निःस्वार्थप्रेम के आगे।

और इस प्रेम की ख़ातिर अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देती है।

हौसला हो निभाने का तभी ऐसी स्त्री से प्रेम करना,

क्योंकि टूट जाती है वो धोखे से, छलावे से,

फिर जुड़ नहीं पाती किसी प्रेम की ख़ातिर।



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
Story 'Changa Po' tells the grandmother of the family in lockdown, while the poem 'Mindless woman' learn about the fame of modern woman


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/2FbqAos
via IFTTT

Post a comment

0 Comments